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उम्मीद का सवेरा| Umeed ka Savera| Poetry by Neha Jha |Meethi Chutney (Hindi)

 



मेरी उम्मीद का सवेरा कुछ धुंधला-सा है

सुबह हो गयी है फिर भी अंधेरा-सा है
शबनम की ताज़गी तो कब की सुख गयी
सपने देखने की भूख भी अब मिट गयी
आवाज़ें जो कहती थी तुमसे ना होगा
लगता है शायद वह ही जीत गयी।

अपना तआरूफ़ अब कारु किस तरह
अपने बुझते हौसले को कैसे दूँ पनाह
अब तो आईना भी पहचानता नहीं मुझे
कहता है कौन हो? जानता नहीं तुझे

मायूसियत के गिरफ़्त में न आना चाहूँ फिर भी
लिपट के हो रही ह शामिल वह मुझ में ही
खो सी गयी है अपनी ही आबरू
ना चाहत है ना ही कोई आरज़ू
हार ही मिलेगी अब तो आदत हो गयी
जीत की तो शायद शहादत हो गयी।

पर मन में एक आज भी उमीद की एक चिंगारी जलती है
अंदर एक आवाज़ धीरे से कहती है
मज़बूत हो तुम, उठो और लड़ो
कल को छोड़ अब आगे बढ़ो
उम्मीद का ही हाथ थामे चलो
धैर्य की रोशनी में ही तुम जलो
देखो, ये वक़्त की साज़िश है
सम्भालो खुद को, गुज़ारिश है
उम्मीद की लौ अब भी बाक़ी है
इस रात की भी तो सुबह बाक़ी है

तो अब मैं
अपने टूटे टुकड़ों को समेट कर फिर से खड़ी हूँ
नयी आशा की किरण संग आगे बढ़ी हूँ
की इस डगर का अंजाम मंज़िल हो
मन भी वही चले जहां दिल हो
जहां सपने और सच्चाई आपस में सहमत हो
जहां मेरे खुदा की रहमत हो
जहां आफ़ताब का नूर रंगीन हो
और हयात मेरी भी आफ़रीन हो!!
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https://youtu.be/Kf9S8mQ3U4c

मौत का बवंडर| Maut ka Bavandar| Poetry by Neha Jha |Meethi Chutney (Hindi)




 पहले खाने को तरसते थे

फिर गंदे पानी से मारते थे
सोचा ना था की एक दिन
मार जाएँगे बस हवा बिन

हवा तो शायद मुफ़्त थी
पर न जाने क्यूँ है अब लुप्त-सी

बिलखती जिंदगियाँ हैं, तरसती साँसे हैं
कल तक छिपाते थे खरब सड़के, अब छिपाते लाशें हैं।

जिए कीड़ों की तरह, अब मौत में भी इंसान नहीं
सड़कों पर है जल रहे क्यूँकि शमशानो में अब जगह नहीं
जीने का हक़ तो पहले ही था छिन गया
अब मारने का भी हक़ नहीं
इस प्रलय से जो बचा ले, पैसों की वह कवच नहीं।

शिकायत करे की शर्मिंदा हो
मारी हुई इंसानियत अब तो ज़िंदा हो
दवा नहीं, हवा नहीं, अस्पताल नहीं
अंगिनत सवालों के जवाब नहीं
हौसला भी कैसे दें, दो शब्द भी अब बचे नहीं ।

महल बन रहे हैं उनके, हमारे अब झोपड़े भी नहीं
कल तक सपने आसमानो में उड़ते थे,
अब ज़मीन पर भी खड़े नहीं

उम्मीद भी अब किस से करे?
कोई सुन भी रहा ह जिस से कहे?
अंधेरे इस समंदर में
मौत के इस बवंडर में
आँकड़ा हम भी कल बन जाएँगे
हम भी सड़कों पर जल जाएँगे।

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https://youtu.be/iGjX-liJGOY


मैं कौन हूँ| Mai kaun hun| Poetry by Neha Jha |Meethi Chutney (Hindi)


मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ
मैं तो मैं में ही संपूर्ण हूँ
दुनिया के शोरगुल में, सुबह की अज़ान हूँ
किसी के निराशा की वजह नहीं, उसकी शान हूँ
हूँ कोयले का अंगार या पहेलियों का जाल
अपनी क़िस्मत का आकार हूँ
कर्म की ललकार हूँ
हूँ धरती का अंश मैं, या उसका सारांश हूँ
शांति की लहर हूँ या मौसम का क़हर हूँ

मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ
मैं तो मैं में ही संपूर्ण हूँ
हूँ नियती के इशारों का शिकार
या मैं ही परवरे-दिगार हूँ
संसार का अहंकार हूँ
ख़ुदा के रूह की पुकार हूँ
हूँ गुजरा हुआ कल या मैं ही काली का काल हूँ
हूँ कठपुतली समय की या उसका संहार हूँ

मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ
मैं तो मैं में ही संपूर्ण हूँ
अज्ञात हूँ, अनंत हूँ या फिर सूर्य-प्रकाश हूँ
मेरे इकछायों की सीमा नहीं, मैं उजला आकाश हूँ
क़िस्मत के आधीन नाहीं, उसकी लकीर हूँ
मोहमाया के जंजाल में, मैं अछूत फ़क़ीर हूँ
हर सवाल का जवाब हूँ
मैं जीवन का शबाब हूँ
तोड़ के देख लो मुझे, हिम्मत लाजवाब हूँ

मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ
मैं तो मैं में ही संपूर्ण हूँ
मैं रातों से क्या डरूँ, मैं अंधेरों का यार हूँ
आंधियाँ क्या गिराएँगी मुझे, मैं खुद उन पर सवार हूँ
शिव की शक्ति हूँ मैं, वेदों का ज्ञान हूँ
भ्रष्ट दुनिया के जाल में, मैं पुनर्विराम हूँ
वक़्त ना भूल सके, मैं वो हसीन दास्तान हूँ
हूँ अपना अभिमान मैं, अपनी ही पहचान हूँ।

मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ
मैं तो मैं में ही संपूर्ण हूँ।

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https://youtu.be/9GdoX-R3TkI

कमबख़्त वक़्त | Kambakht Waqt | Poetry by Neha Jha |Meethi Chutney (Hindi)

 


                                                                        कमबख़्त वक़्त

आज मेरा वक़्त क्या पैग़ाम लाया है
झोले भर ख़ुशियाँ या ग़म तमाम लाया है

लाया है जुगनू सी चाँदनी या सूरज-सी रोशनी
कड़वाहट का काढ़ा या चाशनी की मिठास
रोज़मर्रा की भागदौड़ या लाया है आज, कुछ ख़ास
दिन की माश्रूफ़ीयत या इत्मिनान की शाम
मेरे ख़यालों से छुट्टी या फिर दिल के लिए कोई काम?

सागर की गहरायी या आसमानो की आज़ादी लाया है ?
मेरे ख़ुशियों की आबादी या अरमानो की बर्बादी लाया है?
लाया है आँधी संग बारिश या सुबह की मख्मली धूप?

सपनो की सच्चाई या फिर उन से समझौता
अपनो का असली चेहरा या फिर से कोई मुखौटा?

सुना है वक़्त तेरी तो फ़ितरत है बदलने की
जो तुझे भा जाए उसी के साथ चलने की
मैं तो आज भी उसी मोड़ पर तेरा इंतज़ार कर रही हूँ
मैं भी तुझे भा जाऊँ, मिन्नतें हज़ार कर रही हूँ
कभी ज़मीन तो कभी आसमाँ ढूँड़ रही हूँ
कम्बख़्त वक़्त तेरा पता तो मैं आज भी ज़रे-ज़रे से पूछ रही हूँ।

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https://youtu.be/gbgQfgY3JBM

Yaadon Ki Neev | Poetry by Neha Jha |Meethi Chutney (Hindi)

 


यादों की नीव

बचपन से जिसे घर कहते थे
आज उसे छोड़ने का वक़्त आया है
साथ ले जा रहे हैं वो सारी यादें
जो सालों से घर में संजोई थी
वह सारे दिन, सारी रातें
बचपन से लड़कपन की सारी बातें
यह सारी शैतानियाँ, यह सारी मनमानियाँ

कुछ मुस्कुराते हुए लम्हे
कुछ दिल दुखाने वाले पल
यह सारी सुबह जब घर से बाहर जाने का जी नहीं चाहता था
यह सारी रातें जब लौटकर घर , आनंद आता था
यह सारे पल जब ज़िंदगी ख़ुशी से हँसती थी
और वह सारी रातें जब चैन की नींद घर यह मेरी सोती थी

नए घर जाने की ख़ुशी या इसे छोड़ने का ग़म, पता नहीं आज क्या ज़्यादा है?
अफ़सोस तो यह भी करेगी मेरे जाने पर
इंतज़ार शायद इसे भी रहेगा मेरे लौट आने का
छुप-छुप कर यह भी मुझे रोज़ मिस किया करेगी
मेरे क़िस्से याद कर, अकेले में मुस्कुराया करेगी।

और मैं भी इस घर की हर दिवार, हर छत, हर कोने की तस्वीर साथ लिए जा रही हूँ
धीरे- धीरे इस घर की यादों को सम्भाल कर, समेत रही हूँ।

नए घर की दीवारें भी इतना प्यार करे यह उम्मीद करती हूँ
तुझ जैसे यह भी हर धूप, हर बारिश में हाथ थामे यही चाहती हूँ

वहाँ जाकर भी हर सवेरे तुझे याद किया करूँगी,
नए घर की दिवारों में तेरी परछाई खोजा करूँगी।
ए घर तू भी मुझे याद रखना
कभी लौटकर आयी तो, पहचान कर मुस्कुरा देना।


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https://youtu.be/gzFCpmQdEgc

Thank You Papa ~ Poetry by Neha Jha



थैंक यू पापा

बेटी हुई है, किसिने अफ़सोस जताते हुए कहा,
पर पापा की ख़ुशी का तो ठिकाना न रहा
दौड़ कर वे कमरे में आए,
हाथों को छूकर, माथे को चूम कर
पहली बार ख़ुशी के आंसू बहाए।

पहली बार जब अपने पैरों पर हुई खड़ी
पापा की ही तो उँगली पकड़ कर हुई बड़ी,
साइकल चलाना भी पापा ने ही सिखाया
सही-ग़लत का फ़र्क़ भी तो उन्होंने ही बताया।

स्कूल में कभी जब काम नम्बर आते थे
पापा तो तब भी शाम में हमें बाहर खाने पर ले जाते थे
किसी और से नहीं, खुद से बेहतर बनो
अपने मन की आवाज़ सुनो
यह पापा ने हमेशा ही सिखाया
सच होते हैं सपने यह उन्होंने खुद दिखाया

ज़िंदगी से जब कभी हार जाती थी
पापा की बातों से ही फिर से हिम्मत जुटा पाती थी।

हफ़्ते भर की थकान की बाद भी पापा
संडे को घुमाने ले जाते थे
फिर भी कभी हम से यह, न जताते थे

पापा अपने जूते सालों चलाते थे
पर हमारे लिए हर मौसम, नए लाते थे
अपने सुख की चिंता न की
दुख अपना कभी दिखाया नहीं
परेशान हैं वो भी, यह कभी जताया नहीं।

पापा ने हमें कभी बेटों से काम नहीं माना
कहते हैं अब तो पढ़ कर भी अनपढ़ है ज़माना

थैंक यू पापा हमें सपने दिखने के लिए
थैंक यू पापा हमें ज़िंदगी का असली मतलब समझाने के लिए
थैंक यू पापा हमें उड़ना सिखाने के लिए
थैंक यू पापा हर ठोकर पर उठाने के लिए
थैंक यू पापा हमें सक्षम और मज़बूत बनाने के लिए
थैंक यू पापा हमें अपनी बेटी बनाने के लिए

थैंक यू पापा।


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https://youtu.be/s01q8uh2DBs

अल्फाज़-ए -दिल ~ नेहा झा





नासमझ हैं वो जो नहीं समझते हैं अपना दिल,
जो समझते हैं हर मुक़ाम को अपनी मंज़िल
ना जाने कितने रास्ते हैं जो है अधूरे से 
पर पूरे होने की समझ तो है अधूरे होने से|

शोर में भी है एक अजीब सी खामोशी
भीड़ में भी ढूँढे ये नज़रें उसी को ही,
ना जाने किसकी तलाश है 
ना जाने क्यूँ अधूरी हर आस है|

क्यूँ लगती है ये तन्हाई अब एक आदत सी
क्यूँ एक अजीब कश्मकश हर बार है,
ना दिल है ठिकाने पर ना दिमाग़ है 
क्यूँ हर बार मुझसे जीतती मेरी हार है|

~नेहा झा 

आख़री रास्ता ~ नेहा झा





वह सब कहते हैं की मेरे साथ हैं,
ये सारी बातें करते मेरे जाने के बाद हैं|
कहते हैं कि मैं एक अच्छा इंसान था ,
मेरी प्रतिभाओं पर इनको अभिमान था|

मेरे जाने से दिल इनका टुकड़ों में बिखर गया ,
खबर सुनकर मेरे जाने की, दिल इनका दहल गया|

कहाँ थे जब मैं एक सच्चा दोस्त ढूँदता था ,
कहाँ थे जब मैं रातों का सुकून खोजता था
जब चाहता था कि कोई मेरी बातों को सुने
और चाहता था कि साथ मेरे सपनों को बुने|
जब रातों को खुली आँखों से दीवारों को निहारता था
और सुबह की किरणों से जीने की वजह पूछता था|

तुम हंस कर कहते थे की यह भी बीत जाएगा ,
और मेरा भी अच्छा वक़्त जल्द आएगा |
फिर क्यूँ अपनी ही कही बातों से मुँह मोड़ लिया तुमने,
और मेरे फ़ोन का भी जवाब देना छोड़ दिया तुमने |
ऐसा लगने लगा की मैं तुम्हारे बीच अदृश्य हूँ ,
मौजूद हूँ फिर भी मौजूद, मैं नहीं हूँ|

मेरे मुस्कानों के पीछे दर्द तो देखा ही नहीं तुमने,
कभी मुझे भी गले लगाकर दो बातें कहा ही नहीं तुमने |

अकेलेपन कि लहरों के साथ ही अब बहना था,
ज़िंदगी मिली तो अब इसी के साथ रहना था |

एक रात ना जाने सारी आस ही बुझ गयी ,
सारी हिम्मत जो अकेले जुटाई थी, छन में टूट गयी
फाँसी का फंदा ही लग रहा प्यारा था 
झूठी ज़िंदगी के बदले मौत ही एकलौता सहारा था|

~ नेहा झा 

A Man called Ove- By Fredrik Backman



" We fear it, yet most of us fear more than anything that it may take someone other than ourselves. For the greatest fear of death is always that it will pass us by. And leave us there alone.."

Recently I finished reading this book which falls in the genre of fiction. 

This is the kind of book that grows on you as its chapters unfolds, much like its character, the old grumpy Ove. He has lost his beloved wife Sonja and is reeling under the weight of its grief, in the course of which he tries various ways to end his own life. His grief and loneliness find company when one day his new neighbors, Parvaneh, her husband and 2 kids, come knocking at his door. 

The book makes you realize how your past experiences transform you as a person and how they form the building blocks of what you are. Ove is a man of staunch principles, he is not a people's person and is someone who is strictly brand loyal, uncompromising and abides by his own set of rules. We experience through the book how the tides of misfortune sweep Ove off his feet, how the grief of losing his beloved father and then his wife, eats him from inside and changes him. 

The book beautifully describes the relation between Ove and Sonja and how even after her death she is always there like a shining star in the corner of their house. The years Ove had spent with her were the benchmark against which the rest of his life is measured and no matter how hard he tried, the rest of his life they never lived up to it. 

The book describes the beautiful relation that blooms between Ove and his neighbors and how he is not able to hold himself from from loving them, though, in his own way. 

It is a book which will make you smile as you turn the pages and at the same time make your heart, break into a sob. You experience the generous transformation of Ove's neighbors and a cat which unexpectedly becomes Ove's partner, into his most cherished beings and his new family and Ove, their most loved grand-dad. 

A ray of hope lingers throughout the book, rising slowly: the moments of connection, the re-awakening of a man frozen by grief and the ability of people to brighten up each other's lives. This book makes you believe in the kind of unconditional love, even more. 

I would give this book a 4 on 5 rating. Hope you found it useful and enjoyed reading!





क्या हम भी भारत हैं? ~नेहा झा

    


आज़ाद भारत कहते हैं हमे 
पर क्या हम भी आज़ाद हैं ?
कभी प्यास से कभी भूख से 
मरते हर रात हैं। 

जिन घरों में आराम से रहते हो 
वह हमने ही तो बनाए थे,
जब घुमने निकले थे तुम और रास्तों पर कचरा फैलाया था 
हमने ही तो अगली सुबह तुम्हारे जगने से पहले उसे उठाया था।
जब धोखा दिया था तुम्हें तुम्हारी बड़ी गाड़ी ने 
तुम्हें समय पर ऑफिस पहुँचाया हमारे ऑटो की सवारी ने।
देर रात की पार्टी से जब तुम घर वापस आए थे 
हमने ही तो तुम्हारे बच्चे लोरियों संग सुलाए थे ।
जिन अख़बारों के सहारे सुबह चाय की चुस्की लेते हो
सूरज निकलने से पहले तुम्हारे दरवाज़ों तक पहुँचाये थे ।
बीमारी के डर से जब तुम घरों में छिप कर बैठे थे 
हम तो तब भी बिना घरों के ज़मीनों पर सोते थे।

हवाई जहाज़ों से लाए तुम प्रवासी अमीरों को
छोड़ दिया नंगे पैर धूप में हम बेसहारे ग़रीबों को।
कहते हो की हम तो आत्मनिर्भर भारत हैं  
तुम्हारे वादे हमे अब लगते रेत की इमारत हैं।
कभी रास्तों पर कट गए, कभी पट्रीयों ने जान ली
प्रवासी मज़दूर होने की सजा हमने अब मान ली।

जा रहें हैं घर टूटे सपने और ख़ाली जेबें लेकर 
तुम तो सो रहे हो चैन की नींद हमे भगवान भरोसे छोड़कर।
रखो अब अपने शहरों को तुम 
हम तो खुश हैं अब अपने गावों में,
जब तुमने सिर्फ़ धूप दिया 
सुकून मिली अब हमें इनकी ही छाँव में ।

~नेहा झा