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मौत का बवंडर| Maut ka Bavandar| Poetry by Neha Jha |Meethi Chutney (Hindi)




 पहले खाने को तरसते थे

फिर गंदे पानी से मारते थे
सोचा ना था की एक दिन
मार जाएँगे बस हवा बिन

हवा तो शायद मुफ़्त थी
पर न जाने क्यूँ है अब लुप्त-सी

बिलखती जिंदगियाँ हैं, तरसती साँसे हैं
कल तक छिपाते थे खरब सड़के, अब छिपाते लाशें हैं।

जिए कीड़ों की तरह, अब मौत में भी इंसान नहीं
सड़कों पर है जल रहे क्यूँकि शमशानो में अब जगह नहीं
जीने का हक़ तो पहले ही था छिन गया
अब मारने का भी हक़ नहीं
इस प्रलय से जो बचा ले, पैसों की वह कवच नहीं।

शिकायत करे की शर्मिंदा हो
मारी हुई इंसानियत अब तो ज़िंदा हो
दवा नहीं, हवा नहीं, अस्पताल नहीं
अंगिनत सवालों के जवाब नहीं
हौसला भी कैसे दें, दो शब्द भी अब बचे नहीं ।

महल बन रहे हैं उनके, हमारे अब झोपड़े भी नहीं
कल तक सपने आसमानो में उड़ते थे,
अब ज़मीन पर भी खड़े नहीं

उम्मीद भी अब किस से करे?
कोई सुन भी रहा ह जिस से कहे?
अंधेरे इस समंदर में
मौत के इस बवंडर में
आँकड़ा हम भी कल बन जाएँगे
हम भी सड़कों पर जल जाएँगे।

Checkout the video:
https://youtu.be/iGjX-liJGOY


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