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कमबख़्त वक़्त | Kambakht Waqt | Poetry by Neha Jha |Meethi Chutney (Hindi)

 


                                                                        कमबख़्त वक़्त

आज मेरा वक़्त क्या पैग़ाम लाया है
झोले भर ख़ुशियाँ या ग़म तमाम लाया है

लाया है जुगनू सी चाँदनी या सूरज-सी रोशनी
कड़वाहट का काढ़ा या चाशनी की मिठास
रोज़मर्रा की भागदौड़ या लाया है आज, कुछ ख़ास
दिन की माश्रूफ़ीयत या इत्मिनान की शाम
मेरे ख़यालों से छुट्टी या फिर दिल के लिए कोई काम?

सागर की गहरायी या आसमानो की आज़ादी लाया है ?
मेरे ख़ुशियों की आबादी या अरमानो की बर्बादी लाया है?
लाया है आँधी संग बारिश या सुबह की मख्मली धूप?

सपनो की सच्चाई या फिर उन से समझौता
अपनो का असली चेहरा या फिर से कोई मुखौटा?

सुना है वक़्त तेरी तो फ़ितरत है बदलने की
जो तुझे भा जाए उसी के साथ चलने की
मैं तो आज भी उसी मोड़ पर तेरा इंतज़ार कर रही हूँ
मैं भी तुझे भा जाऊँ, मिन्नतें हज़ार कर रही हूँ
कभी ज़मीन तो कभी आसमाँ ढूँड़ रही हूँ
कम्बख़्त वक़्त तेरा पता तो मैं आज भी ज़रे-ज़रे से पूछ रही हूँ।

Checkout the video:
https://youtu.be/gbgQfgY3JBM

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