नासमझ हैं वो जो नहीं समझते हैं अपना दिल,
जो समझते हैं हर मुक़ाम को अपनी मंज़िल
ना जाने कितने रास्ते हैं जो है अधूरे से
पर पूरे होने की समझ तो है अधूरे होने से|
शोर में भी है एक अजीब सी खामोशी
भीड़ में भी ढूँढे ये नज़रें उसी को ही,
ना जाने किसकी तलाश है
ना जाने क्यूँ अधूरी हर आस है|
क्यूँ लगती है ये तन्हाई अब एक आदत सी
क्यूँ एक अजीब कश्मकश हर बार है,
ना दिल है ठिकाने पर ना दिमाग़ है
क्यूँ हर बार मुझसे जीतती मेरी हार है|
~नेहा झा