वह सब कहते हैं की मेरे साथ हैं,
ये सारी बातें करते मेरे जाने के बाद हैं|
कहते हैं कि मैं एक अच्छा इंसान था ,
मेरी प्रतिभाओं पर इनको अभिमान था|
मेरे जाने से दिल इनका टुकड़ों में बिखर गया ,
खबर सुनकर मेरे जाने की, दिल इनका दहल गया|
कहाँ थे जब मैं एक सच्चा दोस्त ढूँदता था ,
कहाँ थे जब मैं रातों का सुकून खोजता था
जब चाहता था कि कोई मेरी बातों को सुने
और चाहता था कि साथ मेरे सपनों को बुने|
जब रातों को खुली आँखों से दीवारों को निहारता था
और सुबह की किरणों से जीने की वजह पूछता था|
तुम हंस कर कहते थे की यह भी बीत जाएगा ,
और मेरा भी अच्छा वक़्त जल्द आएगा |
फिर क्यूँ अपनी ही कही बातों से मुँह मोड़ लिया तुमने,
और मेरे फ़ोन का भी जवाब देना छोड़ दिया तुमने |
ऐसा लगने लगा की मैं तुम्हारे बीच अदृश्य हूँ ,
मौजूद हूँ फिर भी मौजूद, मैं नहीं हूँ|
मेरे मुस्कानों के पीछे दर्द तो देखा ही नहीं तुमने,
कभी मुझे भी गले लगाकर दो बातें कहा ही नहीं तुमने |
अकेलेपन कि लहरों के साथ ही अब बहना था,
ज़िंदगी मिली तो अब इसी के साथ रहना था |
एक रात ना जाने सारी आस ही बुझ गयी ,
सारी हिम्मत जो अकेले जुटाई थी, छन में टूट गयी
फाँसी का फंदा ही लग रहा प्यारा था
झूठी ज़िंदगी के बदले मौत ही एकलौता सहारा था|
~ नेहा झा
Very well written
ReplyDeleteVery well written.. Kash hum sab yeh sab kisi ke Jana se phele samajh jate...
ReplyDeleteभारतीय समाज के कटु सत्य को बयां करती तुम्हारी ये कविता "आखिरी रास्ता" में बहुत दिल की गहराई है.
ReplyDeleteभारतीय समाज को इस पर विचार करने की आवश्यकता है.
नेहा जी आपने इस कविता मैं पूरी जान डाल दी है.
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