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आख़री रास्ता ~ नेहा झा





वह सब कहते हैं की मेरे साथ हैं,
ये सारी बातें करते मेरे जाने के बाद हैं|
कहते हैं कि मैं एक अच्छा इंसान था ,
मेरी प्रतिभाओं पर इनको अभिमान था|

मेरे जाने से दिल इनका टुकड़ों में बिखर गया ,
खबर सुनकर मेरे जाने की, दिल इनका दहल गया|

कहाँ थे जब मैं एक सच्चा दोस्त ढूँदता था ,
कहाँ थे जब मैं रातों का सुकून खोजता था
जब चाहता था कि कोई मेरी बातों को सुने
और चाहता था कि साथ मेरे सपनों को बुने|
जब रातों को खुली आँखों से दीवारों को निहारता था
और सुबह की किरणों से जीने की वजह पूछता था|

तुम हंस कर कहते थे की यह भी बीत जाएगा ,
और मेरा भी अच्छा वक़्त जल्द आएगा |
फिर क्यूँ अपनी ही कही बातों से मुँह मोड़ लिया तुमने,
और मेरे फ़ोन का भी जवाब देना छोड़ दिया तुमने |
ऐसा लगने लगा की मैं तुम्हारे बीच अदृश्य हूँ ,
मौजूद हूँ फिर भी मौजूद, मैं नहीं हूँ|

मेरे मुस्कानों के पीछे दर्द तो देखा ही नहीं तुमने,
कभी मुझे भी गले लगाकर दो बातें कहा ही नहीं तुमने |

अकेलेपन कि लहरों के साथ ही अब बहना था,
ज़िंदगी मिली तो अब इसी के साथ रहना था |

एक रात ना जाने सारी आस ही बुझ गयी ,
सारी हिम्मत जो अकेले जुटाई थी, छन में टूट गयी
फाँसी का फंदा ही लग रहा प्यारा था 
झूठी ज़िंदगी के बदले मौत ही एकलौता सहारा था|

~ नेहा झा 

4 comments:

  1. Very well written.. Kash hum sab yeh sab kisi ke Jana se phele samajh jate...

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  2. अजय कुमार झाJune 25, 2020 at 7:23 PM

    भारतीय समाज के कटु सत्य को बयां करती तुम्हारी ये कविता "आखिरी रास्ता" में बहुत दिल की गहराई है.
    भारतीय समाज को इस पर विचार करने की आवश्यकता है.

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  3. नेहा जी आपने इस कविता मैं पूरी जान डाल दी है.

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